Saturday, November 19, 2011

काश ! “और वे लम्हे.....? (खंड ६)



काश !
और वे लम्हे  ......................???
 (खंड ६)

सरकस के बाहर एक बार सभी फिर से मिलेबच्चों ने बड़ेआनंद लेकर झूलेचकरी इत्यादि खेलों का पूरा व्योरा दियाहवा मिठाई का तो विशेष रूप से जिक्र कियाजानते हैं , हाथों को फैलाकर बोला, "इतना बड़ा बड़ा हवाई मिठाईमूहँ में रखते  ही गायब"खूब चटखारे ले ले कर कहानी सुनायी  

सरकस का मैनजर   तब तक वहां पहुँच चुका थाआते ही बोला, "आइये  सर अन्दर चलेंबैठने का सारा प्रबंध हमने पहले से कर के रख्खा हैशो अब शुरू होने ही वाला है"  

सरकस के अन्दर सब ने जैसे ही प्रवेश किया कि सर्कस का बिगुल जोरों से बज उठायह शो शुरू होने का सिगनल  थाफिर एक एक कर सारे  खिलाड़ी  ने कतार से मच पर आ कर  करतल  ध्वनि के बीच अपना अपना  अभिवादन प्रकट किया 

सरकस शुरू हो चूका थातरह तरह के खेल करतब दिखाए जा रहे थेघूड़ सवारीहाथी के द्वारा फूटबाल का खेला जानाविभिन्न प्रकार के साईकिलएक पहिया साईकिलतोप से आदमी का निकलनाऔर ना जाने कितने खेल 

तभी एक उदघोषणा हुयी, "अब दिल थाम के बैठियेअपनी जान की बाजी लगाकर आ रहें हैमौत के कुएं में मोटर साईकिल चलानेजरा सी चुक और मौतइसलिए इसका नाम है "मौत का कुआँ" 

स्टेज मौत के कुँए के लिए फटाफट तैयार किया गयानेपथ्य से रोंगटे खड़े करने वाली संगीत की धुनेंसब सांस रोक कर खेल देखने में तन्मय थेमोटर साईकिल की गड़ गड़ आवाज से स्टेडियम गूँज रहा थाएक एक साथ दो दो मोटर साईकिलसच यह वास्तव में मौत का कुआँ ही था जैसे इस मौत का कुआँ” खेल का तमाशा  ख़तम हुआपूरा सर्कस तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा, बीच बीच में सरकस के हरफनमौला जोकर अपनी जोकरई से सबको हँसा   हँसा  के लोट पोट करता रहासरकस की लड़कियाँ भी किसी से कम नहीं थीउन्हों ने भीतरह तरह के खेल करतब दिखाए 

तभी एक और उदघोषणा हुयीअब आज के शो का अंतिम पड़ावहैरतगंज खेल और जांबाज खिलाडियों का दिल दहलानेवाला हवाई खेलदिल के थाम के रखियेऔर सभी से विनती है कि इस खेल के दौरान शांति बनायें रख्खेएक जरा सी चुक और भारी हादसा, भाईओंबहिनों और माताओंओरिएंटल सरकस की ख़ास पेशकसएशिया का फेमस खेल, "ट्रापिज़" 

इस खेल में रसियन खिलाड़ी जांबाज लडके और लड़कियां  भी भाग  ले रहें हैंदिल थाम के बैठियेआपके सामने अब बस कुछ ही छणोँ में पेश किया जाता हैएशिया का मसहूर खेल, "ट्रापिज़"तब तक हमारे मशहूर हरफन मौला जोकर  फंटूश श्री  ४२० के करतब का आनंद उठाईये 

इधर श्रीमान ४२० फंटूश अपना तमाशा दिखला ही रहे थे कि  उदघोषणा  हुई, "दिल थाम के बैठिये और इस सरकस के सबसे मशहूर खेल "ट्रापिज़" का लुत्फ़ उठाईये”, धीमे धीमे रसियन संगीत की धुनों के बीच "ट्रापिज़" शुरू हो चूका था,   हवा में  तैरते हुए,  कलाबाजियां खाते हुएएक झूले से  दूसरे झूले की ओरलड़कें और लड़कियों ने कमाल के खेल का प्रदर्शन कियासब मन्त्र मुग्ध हो उठें एवं करतल ध्वनि के साथ खिलाडियों का अभिवादन कियाएक बार पुनः सर्कस के सभी खिलाडी अंत में दर्शकों का  अभिवादन करने हेतु मंच पर इकठ्ठे हुएजोरों की सिटी  बजी जो खेल समाप्त होने का संकेत थाधीरे धीरे सभी दर्शक बाहर की ओर प्रस्थान करने लगे 

अभी सिनेमा का शो शुरू होने में लगभग एक डेढ़ घंटे का समय बाकी था,घर की महिलाओं को चाय पीने की तलब हो रही थीइन्हों ने अपनी  इच्छा धीरेन   से जताई 

धीरेन   ने कहा, "मैं भी चाय के ही बारे में सोच रहा थाचलो आज मेला के सबसे स्पेसल चाय की दूकान   पर चलते हैंयह दूकान   बनारस से आया हैसुनते हैं कि यह मलाई मार के चाय पिलाता है" 

"मलाई मार के चाय" सभी ने बड़ा आश्चर्य प्रकट किया, पर सब की "मलाई मार के चाय" पीने की इच्छा प्रबल हो उठीसब ने एक स्वर में कहा, "हाँ हाँपहले रेस्टुरेँट में चलकर  कुछ  पेट पूजा कर ली जायफिर ये " मलाई मार के वाली चाय" पीई जाय 

तभी रेस्टुरेँट और होटल वाली गली आ गयी और एक जोरदार आवाज ने सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, “आईये आईये पधारियेयह है दिल्ली के चांदनी चौक का फेमस रेस्तुरांतआपका  अपना  "पंजाबी रेस्तुरांत",   हरदिल लाजवाब स्नैक्सदिल्ली का फेमस कबाब,  चांप,  कटलेट,   सब   कुछ   यहाँ  उचित  दामों में उपलब्ध हैएक बार आजमाइएफिर बार बार खाने  का मन नहीं किया तो पैसा वापस,  इस बात की गारंटी दी जाती हैआईये आईये पधारिये” 

उस ज़माने में  रेस्टुरेँट  में तरह तरह के स्नैक्सजैसे सिंघाड़ा (समोसा)आलू चाँपवेज कटलेटवेजचाँप,  नांन भेज कटलेटनांन भेज चाँप  सर्व किया जाता था, जब कि होटल में केवल नाश्ता, लंच और डिनर सर्व किया जाता था 

सभी ने "पंजाबी  रेस्तुरांत",  में जाना  तय किया और रेस्टुरेँट  मेँ प्रवेश कियाअपने अपने पसंद के स्नैक्स खाए  मजा आ गयासब ने एक स्वर में कहाक्या कटलेट था तो किसी ने वेज चाँप की तारीफ कीकोई सिंघाड़ा से ही खुश थासब बड़े प्रसन्न दीख रहे थे 

यह रहा बनारसी चाय वाले की दूकान  धीरेन   ने चाय वाले दूकान   के मालिक से कहा कि सब के लिए स्पेसल  "मलाई मार के वाली चाय" पिलाईये” 

जीबस थोड़ी देर इन्तेजार करना पड़ेगा साहबभीड़ बहुत हैआपके लिए तो स्पेसल तैयार कराता हूँतब तक यहाँ बेंच पर माता जीऔर बहनजी को बैठने के लिए कहिये”  

थोड़ी ही देर में वह   स्पेसल "मलाई मार के वाली चाय" आ चुकी थीवाह ! ऐसी चाय तो हमनें अपनी ज़िन्दगी में कभी भी नहीं पीसीख लो सुभद्राघर मेँ बनाना होगा धीरेन   ने अपनी पत्नी से कहा  वास्तव  में ऐसी चाय केवल मेले में आने वाले दर्शकों को प्रभावित करने के लिए बनाये जाते थे 

"चलिए  भौजी अब हम आपको बनारसी पान का स्वाद भी चखा ही देते हैंआप भी क्या याद करियेगा खाने के बाद आपके मूहँ से "वाह धीरेन "नहीं निकला तो मैं अपना नाम बदल डालूँगा” 

सभी बनारसी पान वाले की दूकान   पर पहुंचे और स्पेसल बनारसी पान लिया, "पान का स्वाद चखते ही कौशल्या देवी ने कहा, "वाह धीरेन  वाह वाह", "तुमने तो सच्चे कहा थाअब ई पान के बाद यहाँ का  कलकतिया पान खाने का मन भी नहीं करेगा, अब तो  हम रात का खाना खाने के बाद फिर से ई पान खाने के बाद ही घर जायेंगे"कौशल्या देवी ने पान वाले  धन्यवाद ज्ञापन किया 

"तो इसमें कौन बड़का बात है खाना खाने के बाद पान खा कर ही घर रवाना के लिए रवाना होंगेअभी बड़के भैया के लिए दो पान हम बंधवा लेते हैंखुश हो जायेंगे ई पान खा के” 

सिनेमा के शो का टाइम हो चूका थाबनारसी पान मूहँ में दबाये सब विजय टाकिज पहुंचेबाबूजी पहले से ही वहां एक कुर्सी  पर विराजमान थेजैसे ही उन्हों ने सभी  को देखा तो कह बैठे, “कहाँ लगा दी इतनी देरहम यहाँ पर बैठे बैठे कब से इन्तेजार कर रहें हैं” ? धीरेन ने बड़के भैया का मूड शांत करने के लिए बनारसी पान का बीड़ा  निकाला और देते हुए कहा, "ई लीजियेआप के लिए बनवाने में देर हुई, जरा खा कर देखियेऐसा पान ज़िन्दगी में न कभी नहीं खाया होगा और न खाइएगाई कलकतिया पान खा खा के आपके मूहँ का जायका ख़राब हो गया है" 

बाबूजी,  ने देखा कि सबका मूहँ पान से फूला हुआ है और ई धिरेनवा हमको बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा हैपर वे केवल मुसकुरा के रह गएउन्हों ने पान का बीड़ा मूहँ में रख्खामूहँ में रखते  ही उसकी खुशबू  से बाबूजी गदगद हो गएकहासही मेंक्या पान है !

कहा, “अरे धीरेन सिनेमा के बाद याद से आठ दस बीड़ा यही पान का  बंधवा के रख लेनाभूलियो मत” 

विजय टाकिज का मैनेजर बंगाली बाबु तब तक वहां पहुँच चुके  थेआते ही उन्हों ने  कहा, "चलिए चलिएशो का टाइम हो गयासब के लिए वी. आई. पी. क्लास में बैठने का प्रबंध हैधीरेन बाबुघर की महिलाओं को भी इसी में बैठा लीजियेवो जनाना क्लास में तो मारा मारी है 

सभी को बंगाली बाबु का यह अर्रेंजमेंट  पसंद आयाविशेष कर औरतों कोनहीं तो जनाना क्लास में तो डाइलोग भी ठीक से सुनाई नहीं पड़ता हैसभी ने बारी बारी से  सिनेमा हाल में प्रवेश किया 

मेले के सिनेमा हाल का क्या कहना थाटेम्पररी अर्रेंजमेंट का अदभुत नमूना था,  पूरे स्ट्रकचर में बांस और लकड़ी के खम्बो का उपयोग किया गया  था,  हाल  कम से कम एक सौ फीट लम्बा और चौड़ाई तीस फीट तो जरूरे रहा होगा 

स्ट्रकचर के ऊपर बांस की ही टट्टी लगाकर तिरपाल बिछा दिया गया था जो छत का काम करता थातीन  तरफ से साइड में मोटे कपडे डालकर  स्ट्रकचर  को हालनुमा शक्ल दे दिया जाता थासिनेमा घर के कैम्पस के  एक कोने में  जेनेरेटर रूम हुआ करता था जहाँ जेनेरेटर से बिजली पैदा की जाती थीइसी बिजली से प्रोजेक्टर को चलाया जाता था 

हाल के सबसे शुरू में प्रोजेक्टर रूम हुआ करता थादो दो प्रोजेक्टर हुआ करते थेइन प्रोजेक्टरों में कार्बन जलाकर तेज प्रकाश पैदा किया जाता थाइन प्रकाश की किरणें प्रोजेक्टर में लगी फ़िल्म के ऊपर पड़ती थी जिसे हाल के आखिर (एंड) में टंगे पैंतीस एम् एम् के परदे पर फोकस किया जाता थाऔर इस तरह फ़िल्म का प्रदर्शन हो पाता था  

प्रोजेक्टर रूम के बाद सबसे पहला "जनाना (महिलाएं) क्लास"जिसमें बैठने के लिए बेंच की व्यवस्था थीजनाना क्लास के बाद "वी. आई. पी. क्लास" और तब फर्स्टसेकंड और थर्ड  क्लास हुआ करता थाफर्स्ट क्लास में कुर्सियां और सेकंड क्लास में बेंचों की व्यवस्था थी बैठने के लिए, जब कि थर्ड क्लास में पुआल बिछा दी जाती थी बैठने के लिए 

सिनेमा  कैम्पस के एक दूसरे कोने में टिकिट घर हुआ करता थाईटों को कच्ची मिट्टी से जोड़कर उसके ऊपर टीन का छत देकर ये टिकिट घर बनाया जाता था जिसमें तीन अलग अलग खिड़कियाँ फर्स्ट,  सेकंड और थर्ड  क्लास के लिए हुआ करती थीमहिलाओँ के लिए अलग से टिकिट घर बनाया  जाता था 
हाथ  भर घुसने के लिए खिड़कियों में सुराख छोडी जाती थीशौचालय का कोई प्रबंध नहीं थाकेवल महिलाओं के लिए बांस की ही टटियाँ बना कर घेर दी जाती थी और एक जमादारिन को वहां पहरा देने बैठा दिया जाता था 

चूंकि ये सिनेमा घर मेले में केवल एक महीने के लिए शो दिखाने आते थे इसलिए इन पर ज्यादा खर्च करना सिनेमा घर के मालिकों के लिए मुनासिब नहीं  था,  मेला ख़तम होने के बाद  पूरे शरद ऋतु में जिले में लगने वाले प्रायः सभी मेले में यही स्ट्रक्चर उखाड़ कर  लगाया करते थे,  कम से कम खर्च में पूरा स्ट्रक्चर ये तैयार करने में ये माहिर थेआखिर यह उनका बिजनेस जो  था 

टिकिट की बिक्री जोरों पर थीया यूँ कहें तो मारा मरी चल रही थीआज ईतवार होने के कारण बगल के देश नेपाल के शहर विराटनगर और आस पास के इलाके से बहुत लोग मेला देखने आये हुए थे 

कहने के लिए क्यू थासेकंड और थर्ड  क्लास की खिड़कियों पर का सीन बस देखने लायक थाएक के ऊपर एक आदमी चढ़ कर सबसे पहिले टिकिट ले लेना चाहता थावैसे सबको पता था कि टिकिटवा तो मिल ही जायेगा पर पहले लेने की होड़ में यह सब हो रहा थासिनेमा हाल के अन्दर  सीट  नंबर  तो होता नहीं थाजो पहले प्रवेश कियाउसी के अनुसार अपना सीट लूट लिया,  मजे की बात तो ये थी कि किसी को इसकी शिकायत नहीं थीइन सब के ये इतने अभ्यस्त थे कि यह सब कुछ इनके लिए एकदम नार्मल था ;

खैरयह सब हो ही रहा था कि जोरों की सिटी  बजीयह सिनेमा शुरू होने का सिगनल थाकुल तीन सीटियाँ बजती थीपहली सिटी,  आने वाले  दर्शकों को  एलर्ट करने के लिएदूसरी सिटी का मतलब था कि शो शुरू हो चूका है और   समाचार दिखलाया जा रहा हैऔर तीसरी सिटी फ़ाइनल सिटीमतलबपिकचर  शुरू हो चूका है   

फ़िल्म थी "नागिन"की कास्टिंग शुरू हो चुकी थीसभी ने एक साथ कहा, "बाईस रील", मतलब फिल्म की लम्बाई से थाउन दिनों रील के नंबर से फिल्मों की लम्बाई (लेंथ) का अंदाज देखने वाले कर लेते थे, "बाईस रील" का मतलब था कि फ़िल्म लगभग अढ़ाई घंटे की होगीमुख्य कलाकार, "प्रदीप कुमारबैजंती मालाऔर मुबारक' ................!

इसी तरह कास्टिंग आती रही और साथ साथ  दर्शक  फ़िल्म की कास्टिंग के साथ नाम पढ़ते गए और बोलते गएयह एक तरह से परंपरा सी बन गयी थी 

फिल्म शुरू हो चूका थाब्लैक एंड व्हाइट में पिक्चर थीइस फ़िल्म के एक  एक गाने  पहले से ही लोगों की जुबान पर चढ़ चुके थेखूब आनंद ले ले कर बकोध्यानम सभी देख रहे थे,    

एका  एक हाल में  अँधेरा छ गयाअरे यह क्या हुआ तभी एक छोटा सा  कैपसन  परदे  पर  दिखलाई  पड़ा, "रुकावट के लिए खेद है"पता चला कि रील टूट गयी हैहोता क्या था कि ये  प्रोजेक्टर बड़े पुराने  हुआ करते थेअक्सर फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान बीच बीच में रील कट जाया करती थीप्रोजेक्टर को चलाने वाले टेक्नेसियन उस रील को प्रोजेक्टर से उतार कर एक स्पेसल सोलुँसन से जोड़कर फिर से प्रोजेक्टर पर चढ़ा कर शो चालू करतेइसमें पांच  मिनट का समय तो लग ही जाता था 

शो फिर से चालू हो चूका थादर्शक वापस अपने अपने सीट ग्रहण कर चुके थे एका एक सभी दर्शक चौंक पड़े, "अरे ई तो रंगीन पिकचर हो गया ब्लैक एंड व्हाइट से", सभी के मूहँ से एक स्वर में यह शोर गूंजाक्या पिकचर है क्या सीन फिलमाया है और सभी अपनी अपनी सीट पर एकदम से सीधे बैठ गएअटेन्सन की मुद्रा में,एकाग्रचित !, लगा कि शायद ऐसा  नहीं करते तो शायद ई रंगीन सीन नहीं देख पाते 

ई बैजंती माला तो रंगीनवा पिकचरवा में औरो सुन्दर  हो गयी है"किसी दर्शक के ये उदगार थे  बैजंती माला के प्रतितभी सेकेण्ड क्लास में किसी दर्शक ने अपने पास वाले बैठे  व्यक्ति से पूछा, "ई गेवा कलर में है कि ईस्टमेन कलर में" ?

"अरे चुपचाप फिलिम देखो नगेवा कलर है कि ईस्टमेन कलर , क्या फर्क पड़ता है तुमकोरंगीन  है कि नहीं,  इसके पहले  देखा था कभी  कौनो पिक्चर रंगीन में" ? "जानते वानते तो हैं कुछ नहींचले आते हैं बोकराती  झाड़ने" ?  चुपचाप  देखेंगे नहीं और बकर बकर करते रहेंगे 

इतना बोलने से भी उनका मन नहीं भरा था, उन्हों ने अपने पास वाले बैठे व्यक्ति  से बोला, "सारी फिलिम में ई बक बक करते रहे हैंन ठीक से न देखेंगे और न किसी को देखने देंगेइससे तो अच्छा होता कि हम यहाँ पर बैठते ही नहीं"इतना सुनते ही उन सज्जन की हालत बस देखने लायक थी 

फ़िल्म का सबसे हीट गाना "मन डोले मेरा तन डोले" और व मशहूर   "बीन" की धुन सुननें में सभी मस्त थे कि तभी बड़े जोर से थर्ड क्लास में शोर मचाशोर क्या मचा, एक तरह से हडकंप मच गई ;

क्या हुआ क्या हुआ की  शोर से सारा हाल गूँज उठाकिसी ने कहा, "अरे सांप दिखा था हमको" 

किसी ने दर्शक दीर्घा से जोर से चिल्ला कर कहा, 'अरे हम तो बोलिए रहे थे इतना मोहक धुन बनाया है ई बीन का कि सुनके साँपों दौड़ा चला आएगाअरे ई तो सच्चे कमाल हो गया" ;

इतना सुनना था कि ये बात जंगल  की आग की तरह पूरे मेले में फ़ैल गयी कि नागिन फिलिम में बीन की आवाज पर  सिनेमा घर में सांप  घूस आया है अब तो बस पूरे मेले में इसी घटना की चर्चा हो रही थी ;

किसी ने पूछाकै ठो सांप था ?, तो किसी ने जानने की कोशिश की कि कौन सा सांप थागेहुमन कि करैत ?

ई सांप का  नाम क्या लिया कि अब हाल में  तो भगदड़ ही  मच गयीसिनेमा के गार्ड और करम चारी पांच पांच   सेल वाली लम्बी टार्छ लेकर चारों ओर रोशनी फ़ेंक फ़ेंक कर सांप को ढूंडने लगेतभी उनमें  से  किसी एक को सचमुच एक लम्बा सा सांप दीख  ही गया

"अरे ई तो ढ़ोरिया सांप हैइसमें कोई जहर थोड़े ही होता है"इतना कह कर उन महापुरुष ने हाँथ से सांप पकड़ लिया और बाहर जाकर कहीं  दूर फ़ेंक दिया 

बात दरअसल यह थी कि यह  सांप बाहुल्य इलाका थाचारों ओर जंगल और धान के खेत होने के कारण बहुतायत की संख्या में सांप पाए जाते थेइस घटना के पीछे भी यही बात थीजहाँ पर मेला लगा था उसके आस  पास का इलाका धान के खेत का थावर्ष ऋतु समाप्त हो चुकी थी और शरद ऋतु का आगमन हो चूका थाऐसे में ई ढ़ोरिया सांप जो धान के खेत में पानी में रहता थावो निकल आया होगा रात्रि सैर के लिएसांपो को वैसे भी रात में सैर सपाटे में बड़ा आनद आता हैपर बात फ़ैल चुकी थी, ‘सब ने यही सोंचा कि जरूरे नागिन फिलिम के धुन पर ही सांप आया होगा’ ; अनायास ही बिना पैसा खर्च किये फ़िल्म का प्रचार हो गया । पर इस भगदड़ के बीच भी फ़िल्म चालू रहीसब ने राहत की सांस लीऔर पुनः फ़िल्म देखने में मगन हो गए   

तभी परदे पर एक फ़िल्मी सांप हिरोइन  को दंस लेता है, "अरे अभी एक सचमुच के सांप से निबटे ही थे लो ई फिलिम में तो हीरोइने को  सांप से कटवा के मार दियाअब क्या ख़ाक देखें सिनेमाहम तो बैजंती माला को देखने आये थे और अब ई हीरोइने मर गयी" 

"अरे क्या बकर बकर कर रहे होतुम तो ऐसे बोल रहे  हो कि लगता है तुम ही ई फिलिम का स्टोरी लिखे होअभी देखनाहीरो आ के कुछ न कुछ उपाय कर के अपना हिरोइन को बचा लेगाहिरोइन को मार के किया फिलिम को फ्लाप कराएगा" ?

उन महाशय को थोड़ी राहत महसूस हुईपर वो बोले, "ठीक है देखते हैंहाथ कंगन को आरसी क्या अभी थोडिये देर में पता चल जायेगा" 

तभी बाद वाले महाशय की बात सच दीखती हुई देखीफ़िल्म का एंड ठीक इसी तरह से होता हैहीरो आता है,  बीन की वही मोहक धुन बजाता हैऔर जो सांप हिरोइन को दंस कर गया थावही सांप पुनः आकर वापस हिरोइन को दंस करता है,  बैजंती माला जिन्दा हो जाती हैहिरोइन का बाप जो  एक तरह से विलेन है पिकचर मेंवो ख़ुशी  ख़ुशी अपनी बेटी याने बैजंती माला का हाथ हीरो प्रदीप कुमार के हाथ में दे देता है 

फ़िल्म का सुखद  अंत,  सब खुशदर्शक खुशपैसा वसूलसिनेमा मालिक खुशपिकचर तो सुपर हीट है, पूरा कमाई दे के जायेगाफ़िल्म निर्माता भी खुशवाह क्या फ़िल्म बनी और क्या मोहक, मधुर सुन्दर गीतऔर सबसे सुन्दर बीन के संगीत का जादूजिसकी धुन पर सांप भी सिनेमा घर में चले आते हैं 

फिल्म के ख़तम होने के बाद सभी सिनेमा घर से बाहर निकलेभूख के मारे सबके पेट में चूहा दौड़ रहा थाबाबूजी ने पूछा, "खाने के लिए कहाँ चलना है धीरेन" ?

'जी बड़के भैयायहीं पास में कैलाश परबत होटल हैसुने है कि वहां का मीट और चावल खूब टेस्टी बनता हैहम उसको पहले से ही बोल के रख्खे हैं" 

"ठीक हैसब लोग वही चलो. अब जल्दी से खा पी के घर चला जायेरात भी काफी हो चुकी है" 

सभी कैलाश परबत होटल की ओर चल पड़ेहोटल का मालिक पहले से ही सारा प्रबंध कर चूका थाइन लोगों के लिए बैठने की अलग से व्यवस्था की गयी थीफेमिली  केबिन में कुर्सियां लगा दी  गयी थीहोटल  के मालिक ने पूछा कि थाली में परोंसे कि पत्तल में ?

बाबूजी ने कहा कि पत्तल में ही परोसिये, "क्यों जी पत्तल में खाने का मजा ही कुछ और हैलगेगा कि भोज खा रहे हैं"बाबूजी ने अपनी पत्नी से कहा 

"हाँ हाँपत्तले ठीक रहेगापता नहीं थाली वाली ठीक से मांजता भी होगा कि नहींऔर पत्तल में खाना अपने आप स्वादिस्ट भी हो जाता है"कौशल्या देवी ने कहा 

सभी के लिए पत्तल सजा दी गयीहोटल के सर्व करने वाले कर्मचारी एक एक कर  खाना  परोसने  लगेपत्तल में भात परोस दिया गयाउसके ऊपर राहड़ (तुअर) की दालमिटटी के चुकिए में मीट (सालन)साथ में आलू मटर का दमधनिया  और पुदीना कि चटनी,  और  आचारसलाद पापड वगैरह  सब ने चटखरे ले ले कर भर पेट खायाखाने का भी रेट थाली के हिसाब से थाप्रति थाली रेट फिक्स थाजितना चाहिए खाइए 

"क्या बढ़िया खाना बनाया हैलगता है कि शादी व्याह के कच्ची का भोज खा रहे हों"बाबूजी ने कहासब ने लम्बी ढकार ली 

"चलो अब ऊ बनारसी पान खा कर घर चलें"कौशल्या देवी ने धीरेन को पान की याद दिलाते हुए कहा बनारसी पान की दूकान   पर सब ने पान का स्वाद लिया और थाने की ओर बैल गाड़ियों पर सवार होने निकल पड़े 
गाड़ियों का कारवां वापस अपने घर की ओर चल पड़ासभी बहुत थक चुके थेफिर भी मेले की चर्चा सब के जुबान पर थीकोई सरकस के खेल की तारीफ़ कर रहा था तो कोई मलाई मार के वाली चाय’  कीकिसी को कटलेट की याद सता रही थी तो कोई अब तक मीट भात का टेस्ट ले रहा थासभी बड़े प्रसन्न और खुश थेउनके मेले भ्रमण का यह प्रोग्राम इतना जो शानदार बीतासब ने धीरेन की प्रशंसा की ;
बाबूजी ने कहा, "मैं ऐसे ही धीरेन  के गुण  थोड़े ही गाता रहता हूँ" 

धीरे धीरे सब ऊंघने लगेरात का सन्नाटासड़क लगभग सुनसान थीफिर भी नेपाल लौटने वाले मुसाफिर पैदल सड़क पर स्टेशन जाने के लिए चलते दिखलाई पड़ रहे थे, बैल गाड़ियों की चर मर करती हुई आवाजबीच बीच में बैलों की घंटी की टनटनाहट !

क्या शमां थीजब ये कारवां घने जंगल से गुजरतातो भगजोगनी की रोशनी से  जगमगाती सड़क और उस पर झींगुर की आवाजएक अजीब सी शमां थी जिसे शब्दों में व्यक्त करना दिन में तारे दिखने वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात होती  इसे केवल अनुभव किया जा सकता था और कुछ नहींबस केवल  एक अनुभव .............?

वक्त कब बीत गयापता ही नहीं चला. अब तो न बाबूजी रहें और न वह  संजुक्त  परिवारवक्त की गोद में सब धीरे धीरे एक एक कर समां गएसभी चाचाओं के अपने घर और उनका अलग परिवारसभी चाचा भी चल बसे थे 

शहर में बिजली १९६० में आ गयी थी, उस बिजली की चमक ने दीयों की चमक को निगल लिया थाअब शहर में सभी बिजली के बल्ब जलाकर दीपावली मना लेते हैंबस नाम मात्र को खाना पूर्ति के लिए दो चार दीये जला दिएअब कहाँ वो केले की थम्बऔर वो करची के उपर सानी मिटटीउस पर जलते  दीये की रौशनी, अशोक के पत्ते की सजावटसब समय के साथ विलीन हो गए 

और ये मेलेबस नाम मात्र को मेला खाना पूर्ति के लिए अभी भी लगता हैपर अब यह पशु मेला बन कर रहा गया हैशहर की कोई दूकान अब मेला में नहीं जाती हैंन सिनेमा ना ही कोई नौटंकी, मेले की रौनक समय के बदलते परिवेश में विलीन हो गयीमेले की बस याद भर शेष रह गयी है संजोगने को.....................................! 

अब तो केवल यादें रह गयी हैजब कभी नागिन फिल्म के गाने या बीन की धुन सुनता हूँ तो पूरा चलचित्र चल उठता हैजैसे कल की ही घटना हो ? "कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन"किशोरे दा का गाया हुआ यह दर्द भरा गीत कितना साकार हो उठता है !

काश और वो लम्हें .......? "रंजिश ही सहीदिल को दुखाने के लिए आ" 
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इति                                                                                                                                    समाप्त
(ललित निरंजन)



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