Saturday, November 19, 2011

काश ! “और वे लम्हे ? (खंड १)



काश ! और वे लम्हे  ......................??? 
(खंड १)

बिहार के अररिया जिले के अंतर्गत भारत - नेपाल बोर्डर पर विराटनगर से केवल बारह  किलो मीटर दूरी पर  अवस्थित “फारबिसगंज ”, अर्थ व्यवस्था और व्यापार का बहुत ही बड़ा और मुख्य केंद्र रहा है Iपच्चास के दशक में यहाँ का मुख्य व्यापार जूट और धान की फसल थीजो मुख्य रूप से मेवाड़  और राजस्थान से आकर बस गए मारवारियो के पास था 

फारबिसगंज मेला, धरमगंज मेला, खगरा  मेला ये वे नाम हैं जिनसे राज्यभर में अररिया जिले को लोकप्रियता हासिल हैअब जब  ये मेले अब अपनी पहचान खो रहे हैंतब उन दिनों  फारबिसगंज मेले का एक अलग ही विशिष्ट स्थान थाऔर उस ज़माने में इसकी लोकप्रियताबस देखने ही लायक थी   

अक्टूबर माह के समाप्त होते होते "धन कट्टी" (धान काटने की परंपरा को बोल चाल कि भाषा में वहां के निवासी "धन कट्टी" कहा करते हैं),  के बाद आस - पास के गावं वाले अपनी - अपनी फसल को बेचने के लिए फारबिसगंज आया करते थे "धन कट्टी" समापन के पश्च्चात ही काली पूजन के दिन फारबिसगंज मेले का शुभारम्भ हो जाता था I फारबिसगंज मेला, "माँ काली देवी का मेला" के नाम से भी विख्यात है इस मेले में "माँ काली" की भभ्य मूर्ति स्थापित की जाती हैजिनका  पूजन पूरे मेले की अवधी में होता है  काली देवी का यह मेला - प्रत्येक र्वष अक्टूबर - नवम्बर माह में काली पूजन के साथ साथ आयोजित किया जाता रहा है I सरकारी तौर पर तो पंद्रह दिन का मेला लगता थापर शुरू और अँत होते होते यह लगभग एक माह चल ही जाता है माँ काली की मूर्ति के विसर्जन के साथ साथ मेले के समापन की  उदघोषणा  की जाती है 

जलेबी, हवा मिठाई, पिपरा के खाजे, मीना बाज़ार, जादू टोना, झूले, सर्कस, मौत का कुआँ, नौटंकी, पशु बिक्री और न जाने कितने रंग समेटे ये मेले अब अपनी पहचान खो रहे हैं। आधुनिकता का संजाल, ग्रामीणों का पलायन और बदलते जीवन शैली ने इन मेलों का महत्व  कम कर दिया. हर साल शीत  माह में लगने वाले इन मेलो में अब वह आकर्षण  नहीं दीखता जिनके लिए ये सदियों से मशहूर रहे हैं I

सन १९५४ की वह  दीपावलीऔर मेले की वो शाम कैसे भूल सकता हूँ मैंसब कुछ आज भी आईने की तरह साफ़ साफ़ दिखता है आज के ही दिन  माँ  लक्ष्मी  और माँ काली  की पूजा बड़े ही धूम धाम से आयोजित की जाती है हमारे घर पर विशेषकर इस पूजा का आयोजन बड़े पैमाने पर संपन्न किया जाता था परिवार के  सभी सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य थी 

हमारे बाबूजी (चौधरी सुरेँद्  प्रसाद)   की यह कड़ी हिदायत थी कि परिवार के सभी लोग  जहाँ कहीं भी किसी भी शहर में होदीपावली में निश्चित  रूप से सम्मिलित होंबाबूजी का यह आदेश सभी कोई बड़े आदर भाव से पालन करते थे I  

बाबूजी का परिवार बहुत ही लम्बा चौड़ा था, बाबूजी के  अपने ही खुद के सात बेटे थे, और तीन बेटियाँ थी, तीन बेटे और दो बेटियों की शादी हो चुकी थी I साथ में बाबूजी के दो  भाई और उनकी पत्नियां और उनके बाल बच्चे भी बाबूजी के ही साथ रहते  थे  I बड़ा आदर था बाबूजी का पूरे परिवार में, वास्तव में बाबूजी एक पितामह की तरह अपने परिवार में पूजे जाते थे I

बाबूजी बड़े संभ्रांत और धनि व्यक्ति थे अपने इलाके के, एक तरह से उन्हें जमींदार भी कहा जा सकता है क्योंकि बहुत जमीन जायदाद थी, आढ़त का व्यवसाय था, बोरियां की  बोरियां चावल, दाल, तेल बाहर सप्लाई होता था, घर के सभी बड़े सदस्य इसी व्यवसाय से जुड़े थे, सभी एक साथ एक छत के नीचे रहा करते थे, आपस में भाई चारा जबरदस्त था, बहुत इज्जत थी पूरे शहर में, शहर के मुनिसिपलिटी के वे चेयरमेन थे 

बहुत बड़ा मकान और हाता था बाबूजी का, लगभग एक एकड़ जमीन में उन्हों ने बीच "फारबिसगंज शहर" में मकान बनबाया था I मेरी माँ, बाबूजी की पत्नी (कौशल्या देवी), एक नेक और सीधी सादी संभ्रांत घर की महिला थी, पूरा घर उनकी ही देख रेख में चलता था I धर्मपूजा पाठ और ईश्वर पर बड़ी ही आस्था थी उनकी, स्वयं भी नियमित रूप से रोज पूजा पाठ संपन्न करने के पश्चात ही अन्न - जल  ग्रहण किया करती थी, यह उनकी ही आस्था का फल था की आज उनका पूरा परिवार दीपावली पूजन के पावन अवसर पर एकत्रित था I

उस जमाने की दीपावली भीक्या दीपावली होती  थी,  परमपरागत शैली से शहर को सजाया जाता था, बांस काटने  वाले मजदूरों की कारीगरी का क्या कहना था कचचे बांस को काट कर इन्हें  विभिन्न   आकार की करचियों का स्वरुप दिया जाता था केले के थम्ब और   इन बांस की करचियों  को मिलाकर इन्हें नया नया रंग रूप दिया जाता था  

दीपावली की  रात जब इन करचियों पर सने मिटटी के ऊपर रख्खे  तेल के दीये जल उठते थे तो इनकी छंटा बस देखने लायक होती थी  वास्तव में उन दिनों शहर में बिजली तो थी नहीं, सारा शहर  सालों भर रात के अँधेरे में डूबा रहता, बस साल में एक बार दीपावली  की शाम को सारा शहर  इन दीयों की रोशनी से जगमगा उठता थादीयों की रोशनी,  हवा की हल्की झोंको से लहरा लहरा कर इस तरह जलती मानों नयी नवेली दुल्हन अपनी मस्ती में बलखा बलखा कर चल रही हो, क्या अदभुत दृश्य हुआ करता था,

पर अब कहाँ ? अब इन बिजली की चमक ने उन दीयों की चमक को बस अपने में निगल लिया हो, अब तो बस नाम मात्र के दो चार  दीये जला लिए और बिजली के बल्ब  लटका   दियें,  हो गयी  दिवाली   की रस्म पूरी  १९५४ की दीपावली की वह यादगार शाम  अब तो बस केवल यादें रह गई हैं...........................................................................? ? ?

हाँ, १९५४ की दीपावली की उस  यादगार शाम की एक एक तस्वीर मेरे मानस पटल पर आज भी आईने की तरह साफ़ साफ़ दिख रही है  घर के बरामदे में बाबूजी बैठे हुए थे, उन्होंने हमारे पूराने नौकर पोखरिया को आवाज दी .....................................................................................?  ?  ?  ? ? ?
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क्रमश: (आगे की कहानी के लिए खंड २ देखें) 

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