Saturday, November 19, 2011

काश ! “और वे लम्हे... ? (खंड ४)

काश ! और वे लम्हे  ......................??? 
(खंड ४)

राम खेलावन और सरजुगवा दोनों अपने अपने ड्यूटी पर पहुँच चुके थेराम खेलावन समप्नी गाडी  जब कि सरजुगवा  टप्पर गाडी का  गाडीवान थाराम खेलावन ने अपने बैलों का बड़ा प्यारा नाम रख्खा थावह उन्हें "हीरा और मोती" कह कर पुकारता थासरजुगवा भी राम खेलावन से कम नहीं थावह भी देखा देखी अपने बैलों का नाम  "रामा और किशना"  रखा था

दोनों अपने अपने गाडी को चमकाने में लग गएबैलों को बड़े प्यार से नहलायाउनके गले में घंटी बाँधीफिर गाडी को धो धा कर साफ़ सुथरा कियासमप्नी और  टप्पर दोनों गाडी मेला जाने के लिए तैयार खड़े थेधीरेन   ने एक बैलगाड़ी का भी अलग से प्रबंध किया थाघर के  नौकर चाकर के बैठने के लिए   

ठीक एक बजे सभी मेला जाने के लिए बहार बरामदे में   गए, समप्नी और  टप्पर गाडी में सभी मिल जुल कर लद गए समप्नी  गाडी की शान  निराली  थी,  उन दिनों समप्नी गाडी रखना एक प्रेस्टीज  हुआ  करता थाबैल जिस गाडी को खींचता था, उस गाडी के ऊपर चारों कोने पर सुन्दर लकड़ी  के  गोलनुमा  खम्बे लगा दिए जाते थेउन खम्बों पर लकड़ी की तख्ती का ही फ्रेम बनाकर छत जड़ दिया जाता थाअन्दर से खूब अच्छे मोटे रंगीन कपडे का परदा  भी लगाया जाता थाइन परदों को गिरा देने से  प्राइवेसी हो जाती थीपरदों में छोटे छोटे झरोखों जैसी खिड़की का भी प्रबंध किया जाता था, वहीँ  टप्पर गाडी का डिजाईन अलग किस्म का थागाडी के ऊपर बांस और टट्टी   का अर्ध गोलाकार छतनुमा बनाकर उसे रंगीन तारपोलिन से ढँक दिया जाता था जो छत का काम करता था, टप्पर गाडी आमने सामने से खुला रहता थाकिसी किसी में परदा डाल कर उसे भी बंद करने का प्रबंध था 

समप्नी गाडी,  टप्पर गाडी से सुपेरिअर माना जाता थाराम खेलावन को इस बात का गुमान था कि वह समप्नी गाडी का गाडीवान थाइसलिए वह अपने को सरजुगवा से थोडा सिनिअर समझता  थासरजुगवा इस बात को समझता थाइसलिए वह राम खेलावन को "बड़के भैया" कह कर संबोधित करता थाराम खेलावन को जब वह बड़का भैया कह के पुकारता तो उसे अपने सिनिअर होने का गर्व होता ।

राम   खेलावन की समप्नी गाडी सबसे आगे निकली,  ठीक उसके पीछे सरजुगवा की टप्पर गाडी और उसके पीछे पीछे हरिया की बैल गाडीहरिया नाम था उस बैल गाडी के गाडीवान का 

कौशल्या  देवीधीरेनविरेनउनकी दोनों देवरानियाँ और पोते पोती सब समप्नी गाडी में बैठेबांकी लोग टप्पर गाडी मेंजो बचे खुचे और नौकर चाकर थेहरिया की बैल गाडी में बैठ गएइस तरह ये  कारवां  मेला की ओर प्रस्थान कर गया 

घर से  मेले तक  का सफ़र लगभग डेढ़ घंटे का थामेला कोई एक डेढ़ कोस (चार - साढ़े चार किलो मीटर)  की दूरी पर लगा थामेला के लिय वह स्थान निर्धारित थाहर साल मेला वहीँ लगता थामेले के लिये डाक बोली जाती थीसबसे ज्यादा डाक बोलने वाले को  पूरे  मेला का छेत्र मेले अवधि के लिया लीज पर दे दिया जाता थाडाक से मिली रकम को माल खाने (ट्रेजरी) में जमा कर दिया जाता था, जिसे मेले का बंदोबस्त मिलता वह मेले की सरजमीन को मेले में आने वाले सिनेमा घरसर्कस, दूकानहोटल वगैरह के अनुसार प्लाटिंग कर के डाक के द्वारा एलाट कर देता था जिसमें उसे प्लाट के हिसाब से पैसा मिलता थावही उसकी आमदनी हुआ करती थी    

राम खेलावन बड़ी सावधानी के साथ अपनी सम्पनी गाडी को चला रहा थाबड़ा बातूनी था राम खेलावनचुप तो वह बैठिये नय सकता थाअभी थोड़ी दूर ही वह निकला होगा कि वह बोल उठा ,"जानत हैं मलकिनीई जो हीरवा और मोतिया हैं नवो दोनों अपन अपन किलवा  को पहचानता हैहीरवा को अगर मोतिया के जगह जोत दो तब  चलबे नय करेगावही हाल मोतिया का भी हैदोनों अपना अपना जगह पक्का कर के बैठ गया हैहीरवा का ई बायां और मोतिया का दायाँ फिक्स हैहम जब भी इनको जोतते हैं तो इस बात का पक्का ध्यान हमको रखना पड़ता है, 

अभी देखियेकितनी मस्ती में दोनों ताल मेल ताल मिला कर चल रहे हैंऐसी जुगल बंदी कि बड़का बड़का सहनाई वादक बिसिमैल्ला खान और तबला बजाने वाले दांतों तले उंगली ना दवा ले तो मलकिनी आप हमरा नाम बदल डालियों, उधर सरजुगवा भी कुछ इसी तरह की हांक रहा था 

कौशल्या देवी और सभी को राम खेलावन की बातों में बड़ा रस मिल रहा थातभी कौशल्या देवी ने राम खेलावन से पूछा

"हम तुमरे गाना की बहुते तारीफ़ सुने हैं, कौनों लोक गीत सुना दो सबको” 

"अब आपके सामने हम क्या गायेंहमको शरम लगती हैआपके सामने तो आज ही हम जुबान खोले हैं" 

"अरे शरम का क्या बात हैसब तो घर के ही लोग हैं. इनसे कैसी शरम" 

"ठीक है मलकिनीआपका हुकुम हम कैसे टाल सकते हैंअब हमको जो थोडा बहुत गीत आता है वही हम आपको सुनाते हैं" 

इतना कह कर राम खेलावन "लवकुश दीक्षित का लिखा अवधी भाषा का प्रसिद्ध लोक  गीत गाता है जिसमें भाभी द्वारा देवर की बदमासियों ,शरारतों का  बड़ा प्यारा वर्णन हैइस गीत में भाभी बताती है कि देवर पुत्र के समान होता हैऔर देवर से कहती है कि अपनी शैतानियां समाप्त कर दे नहीं तो मैं देवरानी को बुलवा लूंगी ताकि तुम्हारी विरह की आग ठंडी हो जाएगी | भाभी कहती है कि जैसे भाई के साथ सावन मनाया जाता है वैसे ही मैं तुम संग होली खेलूंगी"

और फिर राम खेलावन ठेठ  देहाती स्ट्याल में जोर जोर से सुरु हो जाता हैसभी बड़े तन्मयता के साथ  सभी  उसके गाये गीत को सुनते हैं और बीच बीच में एक दूसरे  से उसका अर्थ समझने की कोशश करते है !     

 “निहुरे निहुरे कैसे बहारौं अंगनवाटुकुरु टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा,
निहुरे निहुरे कैसे बहारौं अंगनवाटुकुरु - टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा,

भारी अंगनवा न बइठे ते सपरै,  निहुरौं तो बइरी अंचरवा न संभरै,
लहरि-लहरि लहरै -उभारै पवनवाटुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।

छैला देवरु आधी रतिया ते जागैचढ़ि बइठै देहरी शरम नहिं लागै,
गुजुरु-गुजुरु नठिया नचावै नयनवाटुकुरु टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा 

गंगा नहाय गयीं सासु ननदियाघर मा न कोई मोरे-सैंया विदेसवा,
धुकुरु-पुकुरु करेजवा मां कांपै परनवाटुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा 

रतिया बितायउं बन्द कइ-कइ कोठरिया,  उमस भरी कइसे बीतै दोपहरिया
निचुरि-निचुरि निचुरै बदनवा पसीनवाटुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।

लहुरे देवरवा परऊं तोरि पइयांमोरे तनमन मां बसै तोरे भइया,
संवरि-संवरि टूटै न मोरे सपनवांटुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।

माना कि मइके मां मोरि देवरनियाबहुतै जड़ावै बिरह की अगिनिया,
आवैं तोरे भइया मंगइहौं गवनवांटुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।

तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,  जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,
भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवाटुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा 

राम खेलावन के गीत सुनकर सब मन्त्र मुग्ध हो जाते हैंकौशल्या देवी कहती है  कि कितना  बढ़िया  चित्रण देवर  भाभी के सम्बंद्भों का है इस गाने में  

धीरेन ने बड़की भौजी से कहा, “अरे भौजी लोग अपने देवर की बात नय समझंगे  तो और कौन समझेगा, उसने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहाक्यों सुभद्रा है कि नहीं" ? 

"क्यों लल्ला जीई क्या कह रहे हैंसुनते हैं नहम भी तो आपके मन की बात जान लेते हैंसुभद्रा ने चुटकी लेते हुए अपने देवर हिरेन से कहावह हिरेन को लल्ला ही कह कर पूकारती थी  

हिरेन की पत्नी बस मुस्कुरा कर रह गयीइन हंसी मजाकों के बीच एक  घंटा का सफ़र कब कट गया किसी को पता भी नहीं चलासच अच्छा समय बस देखते देखते बीत जाता है 

तभी राम खेलावन ने गाडी रोक दीसभी ने लगभग एक स्वर में पूछा, "क्या हुआ राम खेलावन" ?

"जी मलकिनीई हमरा घर  गयाहमरा बड़का भाग्य कि आज आप सब लोग एक साथ हमरा घर में पधारें हैमलकिनीहमरा बहुते दिन से मन था कि एक बार आप हमरे भी अंगना में अपना पावँ रख देतेहमारा घर पवित्र हो जाता   

अब यह प्रोग्राम तो आज के एजेंडा  में था नहींउस पर सब को लग रहा था कि मेले के लिए विलम्ब हो जायेगापर राम खेलावन के आग्रह को भी तो ठुकराया नहीं जा सकता थासब असमंजस की स्थिति में थे तभी कौशल्या देवी ने कहा, "हाँ हाँ राम खेलावन, हमें भी   अच्छा   लगेगाअरे सब लोग नीचे उतरो" 

राम खेलावन  पहले ही से यह  प्रोग्राम बना कर  बैठा  था, वह पास के गाँव की पराईमरी स्कूल से दो चार बेंच और एक दो टेबुल ले आया थासभी नीचे उतरेदेखा एक मिटटी का घरमिटटी की दीवालेंऔर उसके ऊपर खपरैल टीन का छतदो कमरेएक सामने की ओर बरामदा और एक पीछे अंगने की ओरफर्श मिटटी की ही थी, पर बिल्कुल चिकनी दीख रही थीऐसा लग रहा था की मानों अभी अभी इसे चिकनी मिट्टी से पोंछा गया हो

घर के ठीक सामने एक चांपा कल गड़ा हुआ थादो लालटेन बरामदे में लटके हुए थेजिसके  शीशे टूटे हुए थेएक दो टूटी फूटी कुर्सी और एक पुराना  हो चूका बेंच भी रखा हुआ  थाचारों ओर हरियाली ही हरियाली   थीराम खेलावन ने वहां की स्थानीय पेड़ पौधेझाड - फूल  से घर को सजा रखा  थाइस नीरे देहात में मिट्टी का घर इतना साफ़ सुथरा और हरा भरा हो सकता हैइसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थीसंभवतः राम खेलावन का यह घर सही मायने में भारत वर्ष के ग्रामीण इलाकों की छवि दर्शा रहा था 

सभी नीचे उतरेराम खेलावन की मेहरारू सरस्वती देवी जिसे राम खेलावन प्यार से "सरसतिया" कह कर पुकारता थादौड़ी  दौड़ी वहां आयीएक हाँथ से वह अपने सर पर रख्खे साडी के पल्लू को संभाल रही थी,   आते ही उसने सब के पावँ छू छू कर प्रणाम कियाराम खेलावन के दोनों बेटे और एक बेटी भी तब तक वहां पहुँच चुके थे, उन्हों ने भी सभी के  पावँ छुए 

राम खेलावन ने कहा, "मलकिनीआप लोगन तनिक बैठ कर सुस्ताइयेहम अभी मिशिर  जी के यहाँ से चाय ले आते हैंअरे सरसतिया,  गिलास लोटा मांज के ताजा पानी चांपा कल से भर कर सब को पिलाओ तब  तक हम चाय लेकर आ जायेंगे” 

"अरे राम खेलावनये मिशिर जी कौन हैं और उनके यहाँ से चाय ले के पिलाओगे ? क्यों ?

"जी मलकिनीई मिशिर जी यहाँ पास के पराईमरी इस्कूल के मास्टर हैंयहीं बगले में रहते हैंअब हमरे घर का चाय  हम आपको कैसे पिला सकते हैं" 

कौशल्या देवी को सारी बात समझ में आ चुकी थीदर असल राम खेलावन निचली जाति से था और उन दिनों बड़े जाति वाले निचली जाति के हाँथ का पानी तक नहीं पीते थेपर कौशल्या देवी इन सबसे बिलकुल अलग किस्म की महिला थीउन्हों ने कड़क आवाज में राम खेलावन को लगभग डांटते हुए कहा, "ई मिशिर जी उसीर जी के यहाँ से लाने  का कोई जरूरत नय है,  सरसतिया चाय बनाएगीउसी  के हाँथ का चाय हम सभी पीयेंगेक्यों धीरेन” ?

राम खेलावन ने बड़े कातर  भाव से कौशल्या देवी की ओर देखते हुए सरसतिया से कहा,"अरे खड़ी खड़ी  अब हमरा मूहँ क्या देख रही हैजल्दी से चाय चूल्हा पर चढ़ा दोऔर जितना जल्दी हो सके चाय बना कर सबको पिलाओराम खेलावन  अपने गमछी की कोर से अपनी नम आँखों को पोंछने लगासभी ने गौर किया की राम खेलावन गमछी से आँख पोंछने के बहाने अपनी नम आँखों को छुपा रहा हैइधर मन ही मन राम खेलावन ने सोचाइतना मान सममान तो किसी ने भी पहले नहीं दियासब दिन  ऊँच परिवार के लोगन सब नीच दृष्टी  ही से हमको देखिन हैं और आज इतना मान,  सम्मान ?

सच्चे जितना मलकिनी के बारे में सुनते थेउससे भी ज्यादा अच्छी निकलीजरा भी भेद भाव नहीं, ऐसन मालिक मलकिनी बड़े भाग्य से किसी को मिलता हैअब तो हम क्याहम्मर सब लड़कन भी अपनी ज़िन्दगी यही ड्योढ़ी पर गुजार  दें तो भी ई रीन नय चूका पाएंगेराम खेलावन एक दम से भावुक हो उठा था  

सरसतिया मिटटी के चूल्हे पर लकड़ी जलाकर जल्दी से चाय बना कर मिटटी के ही कुल्हड़ में ले आयीसाथ में सूखा भुना हुआ चनाचिउड़ा और कुछ बिस्किटसभी ने सरसतिया के चुस्ती  की मन ही मन तारीफ की  चाय एक दम कड़क बनी थी,

धीरेन कह उठा "मजा आ गया राम खेलावन,  सारी थकन उतर गयीअब जल्दी से गाडी जोतो और चलने की तैयारी करो   । कौशल्य देवी ने राम खेलावन से कहा  "अरे राम खेलावनतुम बहुते भाग्यवान हो कि तुमको  सरसतिया जैसी मेहरारू मिलीदेखा इतना आदमी का चाय झटपट बना कर ले आयीफिर उन्हों ने धीरेन   से पच्चीस रुपैये लिए और सरसतिया के हांथों में देते हुए बोली ;

 "सरसतियाई तुम रख लो, जाड़ा आ रहा हैबाल बच्चन का गरम कपड़ा सिलवा देनाऔर अपने लिए भी एक साडी मेला में खरीद लेना जरूर सेराम खेलावन को ई पैसा मत देनापता नहीं पी पा के सब उड़ा देगा" 

नहीं मलकिनीहमको ई सब आदत नय हैसरसतिया तुम मलकिनी को बताओनहीं तो ई हमर बात का विशवास नय करेंगी"  सरसतिया ने लजाते हुए एक बार फिर सभी के पाँव छुए और लड़कन सब को भी ऐसा ही करने का इशारा किया  

"अरे राम खेलावनलड़कन सब को भी मेला घुमाने ले चलोफिर सब लड़कन की ओर देखते हुए बोलीफटाफट जल्दी से अच्छा वाला पैंट कमीज पहिन कर बैल गाडी में बैठ जाओ  हम सब मेला देखने जायेंगे 
बैल गाड़ियों का यह कारवां एक बार फिर से मेला की ओर प्रस्थान कर गया 
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क्रमश: (आगे की कहानी के लिए खंड ५  देखें) 

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