काश ! “और वे लम्हे ......???
(खंड २)
"अरे पोखरिया, दीया बत्ती सब ठीक कर लिया है ना", बाबूजी ने जोर से पोखरिया को पुकारते हुए बोले I
"जी मालिक,सब फिट है, ऊ बदरिया भी केले का सब थम्ब काटकर लगा दिया है, अब उसमें करची घोपने का काम में लगा हुआ है, शाम होते होते ऊ अपना काम निबटा लेगा, फिरू तो हम उसमें मिटटी सान के चिपका देंगे, बस, बाकी सब बबुआ लोगन दीया बत्ती ठीक करन में जुटल हैं, सारा सामान मंगवा लिए हैं, आप कौनों चिंता नहीं करो मालिक", इतना कह कर पोखरिया बाबूजी के पैर थाम कर पैर टीपने की मुद्रा में बैठ गया I
"अरे अभी छोड़ दो आज, अभी पैर दबवाने का मन नहीं हो रहा है”, और हाँ कुरसी - टेबुल सजा कर लगा दो, महराज (बावर्ची) को बोलो कि सबका चाय बाहर ही लगा दे, थोडा प्याज वाला कचड़ी भी छान कर चाय साथ लगा देगा, और हाँ सब को खबर कर दो कि सभै का चाय बाहर में लग रहा है, सब लोग तैयार होकर आ जाएँ, मलकिनी को भी बोल देना" I बाबूजी पोखरिया को सारी हिदायतें देकर ही चुप हुए I
"जी मालिक", हम अभी सबको आपका हुकुम पहुंचा देते हैं I इतना कह कर पोखरिया वहां से बाबूजी के हुक्म की तामिल हेतु प्रस्थान कर गया I
एक एक कर बाबूजी के परिवार के सभी सदस्य वहां पहुँच चुके थे, मेरी मां जिन्हें सब नौकर चाकर "मलकिनी" कह कर बुलाते थे वो भी यहाँ आ चुकी थी , चाचा जी, चाची, सभी वहां मौजूद थे, बाबूजी का जो हुक्म था ।
महराज ट्रे में चाय और प्याज वाला कचड़ी ले आया था, चाय की चुस्कियां लेते लेते बाबूजी ने अपनी पत्नी से पूछा "हाँ तो पूजा की तैयारी हो गयी ? पंडित जी कितने बजे आयेंगे ?
"जी, साढ़े छः बजे का टाइम दिया है", कौशल्या देवी ने कहा, "तब तक अँधेरा भी हो जायेगा" ।
“और दीया बत्ती, मिठाई, सब इन्तेजाम हो गया है न, कुछ घटता है तो बोल दो, अभी मंगवा लेते है” ।
"नहीं, आप चिंता फिकर न करें, सब तैयार है, फिर कौशल्या देवी ने सभी की ओर देखते हुए कहा कि "सब लोग ठीक छः बजे तैयार होकर पूजा घर में आ जइयो, और सब लोग नया कपड़ा जो सिलवाया है वही पहनना, आज के दिन नया कपड़ा पहनने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं" ।
बाबूजी ने कहा, "अरे धीरेन, और मेले की क्या खबर है, मेले की सब तयारी हो गयी है क्या ? बी.डी.ओ. साहब से तुम्हारी भेंट तो हुई होगी" ?
जी बड़े भैया, आज ही दोपहर में भेंट हुई थी, उन्हों ने कहा कि कल से मेला पूरे जोर शोर से शुरू हो जाएगा ।
"इस बार मेले में क्या क्या आया है, कै ठो सिनेमा घर चल रहा है” ?
"बड़े भैया, बी.डी.ओ. साहब बतला रहे थे कि इस बार चार चार सिनेमा घर को लाइसेंस मिला है चलाने के लिए, और एक सर्कस, दो दो नौटंकी भी है, बोल रहे थे कि खूब चहल पहल और रौनक रहेगी ।
"अच्छा ई पता चला कि कौन कौन फिलिम आ रहा है" ?
"जी बड़े भैया, सुन रहें हैं कि ई बार "नागिन" फिलिम सबसे ज्यादा चलने वाली है" ।
"अरे, वही ना, जिसका ऊ गाना बड़ा हिट हुआ है, क्या तो है ? बाबूजी याद करने की कोशिश कर ही रहे थे तब तक नतिन, बड़े भैया बोल उठे, "मन डोले मेरा तन डोले” !
"हाँ, हाँ वही”
अरे धीरेन, बी.डी.ओ. साहब से कह कर ऊ पिकचरवा का “पास” लिए बनवा लो सब के " ?
उन दिनों सिनेमा देखने के लिए “पास” लेकर देखना बहुत बड़ी बात होती थी, ऐसा नहीं था कि बाबूजी टिकिट नहीं खरीद सकते थे, टिकिट भी सस्ता ही था, फर्स्ट क्लास का डेढ़ रुपैया, पर पास लेकर देखने वाले के लिए सिनेमा हाल मेँ फर्स्ट क्लास से पहले का एक कतार सुरक्षित रखा जाता था, जिसमें आराम दायक कुर्सियां लगाई जाती थी, इसे वी. ई. पी. क्लास कहते थे, शहर के सभी गण्य - मान और प्रतिष्ठित व्यक्ति को ही पास “इसु” किया जाता था , पास सिनेमा कामैनजर “इसु” करता था ।
उस वक्त शहर के बी.डी.ओ. साहब और दारोगा जी बहुत बड़े हाकिम हुआ करते थे, एक तरह से वो जो बात कह देते, शहर के किसी भी व्यक्ति की क्या मजाल कि उस बात को टाल पाते ।
मेले का सारा प्रबंध बी.डी.ओ. साहब और दारोगा जी के ही जिम्मे था, धीरेन की बी.डी.ओ. साहब और दारोगा जी दोनों से अच्छी बनती थी या यूँ कहें दोस्ताना था, साथ उठना बैठना, और कभी महफ़िल भी लग जाती थी जिसमें पीना पिलाना भी चलता था, धीरेन बड़ा ही प्रैक्टिकल व्यक्ति था, इसलिए उसने इन लोगों से अच्छी दोस्ती बनाकर रख्खी थी, बाबूजी को ये बातें मालूम थी, इसलिए उन्हों ने धीरेन से यह प्रश्न किया था । कौन सा दिन ठीक रहेगा जी ? बाबूजी ने अपनी पत्नी से पूछा "शनिचर या ईतवार” ?
“ईतवारे को रखिये, सब के लिए ठीक रहेगा” ।
तभी धीरेन अपने भाभी की ओर देखते हुए बोला, "ठीक है भौजी, हम बी. डी. ओ. साहब से मिलकर पास का इन्तेजाम कर लेंगे, आप चिंता मत करो, और सब लोग ठीक से सुन लो, ईतवार का दिन फिक्स हुआ है मेला जाने के लिए, दिन का खाना खाने के बाद सब मेला चलेंगे, बच्चों के लिए भी बहुत कुछ आया है इस बार, और पंजाब, लुधियाना से गरम कपड़ा का ढेर सा दूकान आया है, जिसको खरीदारी करना है उसका लिस्ट उस्ट पहले से बना लो भाई, उससे आसानी रहेगी, इतना कह कर धीरेन ने बड़े भैया से कहा, "ठीक है न भैया" ?
बाबूजी ने सहमति में अपने सर को हिलाया, फिर पत्नी की ओर देखते कहा कि "ए जी, पोखरिया के हाँथ एक कप चाय और मेरा पान भेजवा दो, चाय पीकर हम भी तैयार हो जाते हैं, मेरा बंडी, कुरता और धोती निकल कर रख देना, पोखरिया को कह दो कि एक बाल्टी गरम पानी कर के गुसल खाने में रख देगा” ।
“और धीरेन, तुम एक दो सम्पनी या बैल गाडी का भी इन्तेजाम कर लेना, सभी लोग आराम से मेला जा पाएंगे” ।
धीरेन ने कहा, "सब हो जायेगा, बस आप फिकर मत करिए, हम और बिरेन हैं ना" ।
नतिन ने कहा,"चाचा जी, मेरे लिए भी जो काम होगा बताइयेगा" ।
सब लोग धीरे धीरे वहां से उठ कर पूजा के लिए तैयार होने को चल पड़े, बाबूजी ने गुड़ेगुड़े का लम्बा सा कश खींचा और चाय की प्रतीक्षा में अपने आराम कुर्सी पर लेट से गए ।
पूजा की सारी तैयारी हो चुकी थी, परिवार के सभी सदस्य पूजा घर में एकत्रित हो चुके थे, बस पंडित जी के आने की प्र्तिक्च्छा थी, तभी पोखरिया ने आकर सूचना दी कि पंडित जी भी आ गए हैं ।
पंडित जी ने आते ही बाबूजी से कहा, "परनाम बाबूजी" ।
बाबूजी ने भी पंडित जी को सम्मान देते हुए कहा "पंडित जी, परनाम" ।
पंडित जी ने मेरी माँ से पूछा "मलकिनी, सब इन्तेजाम हो गईल बा", पंडित जी भोजपुर इलाके के थे, वे भोजपूरी में ही बातें करते थे ।
"हाँ पंडित जी, पूजा शुरू करिए", बस आपकी ही प्रतीक्षा हो रही थी ।
परंपरागत तरीके से पंडित जी ने मां लक्छ्मी और मां काली की पूजा अर्चना संपन्न की, फिर उन्होंने आरती गाया, "ॐ जय लक्छ्मी माता, ॐ जय काली माता ........................!
पूजा संपन्न हो चुकी थी, पंडित जी ने अपना प्रसाद और दक्षिणा लिया और फिर बिना कोई समय गवाएं वहां से पूजा कराने हेतु दूसरे घर की ओर चल दिए, आज पूरी शाम के लिए जो वे बुक थे ।
इधर आरती की थाल में दीया सजा कर कौशल्या देवी ने अपनी देवरानी से कहा, "ई परात में बहु ‘१०८ घी’ का दीया पूजा घर जला कर रख दिओ , और अपनी बड़ी बहु से कहा, ‘धीरेन की बहु, बाहर बरामदे में भी जो रँगोली बनाया है उस पर
‘१०८ घी’ का दीया जला कर सजा दो, सब लोग प्रसाद ले लो और सब जगह दीया बत्ती कर दो” ।
पुनः कौशल्या देवी ने महराज को रात के खाने के लिए ढेर सारी हिदायतें दी, "कहा, आज विशेष खाना बनेगा, खाना में आलू - मटर का दम, बैंगन - बड़ी की सूखी सब्जी, अरवा चावल, पूरी, चने की दाल और धनिया पुदीना की चटनी, ई सब बनेगा आज, और हाँ ध्यान से सब खाना बनाने के बाद पहले भगवान जी को भोग लगाना मत भूलियेगा, आज का भोजन प्रसाद के रूप में खाया जाता है" । सब ठीक से समझ में आ गयल कि नहीं" ? कौनों गड़बड़ न होई एकर ध्यान रखियो ?
"मलकिनी, अपने कौनों चिंता मत करियो. हम सब समझ गयलिये, जैसन कहलियो वैसने सब टाइम पर हम तैयार कर देव”, महराज ने कहा ।
“बड़ी बहु, तू आलू मटर का दम का दम पका लियो, और मंझली बहु तू बैंगन - बड़ी की सूखी सब्जी ।
"अरे पोखरिया, गंगवा कहाँ है ? सब दीया में तेल बत्ती कर दिया है न", फिर नतिन, जतिन सब की ओर देखते हुए कहा "अब बाहर भी सब दीया जला लो, टाइम हो गया है", इतना कहने के बाद ही कौशल्या देवी ने दम लिया ।
सब अपने अपने काम में लग गए, पोखरिया और गंगवा ने बांस के थम्ब में घोंपे हुए करची पर सानी मिटटी चिपकाई और उसके ऊपर थोड़े थोड़े अंतराल पर दीया सजाना शुरू कर दिया, नतिन, जतिन सब ने मिलकर दीये में तेल डाला, और बत्ती सजा दी, सभी बाबूजी का इन्तेजार कर रहे थे कि पहला दीया वे प्रज्वलित कर दें फिर सब दीया जलाने का काम शुरू हो जायेगा ।
बदरिया ने इस बार कड़ी मेहनत से बांस और करची को मिलाकर मेन गेट के द्वार को सजाया था, दोनों ओर केले के थम्ब में करची घोंप कर उसके ऊपर की ओर गोलाकार आर्च टाइप का आकर दिया था, और बांसों के बीच बीच में बड़े डिजाईन से घोंपा था करची , सच, जगह जगह अशोक के पत्ते सजा कर, अपनी कारीगरी से उसने चार चाँद लगा दिया था ।
"अरे पोखरिया , छत पे दीया बत्ती किया है कि नहीं" ? धीरेन ने पूछा ।
"जी मंझले मालिक, सब फिट है, अब बाबूजी दीया जला दें तो हम छत पे जाकर सभै दीया जला देंगे हाँ" !
तभी बाबूजी खद्दर का धोती और कुरता, कुरते पर कथ्थई रंग की बंडी और काँधे पर शाल रख कर बरामदे में प्रवेश किया, सभी बाबूजी की ओर बस देखते ही रह गए, मेरी माँ ने आगे बढ़ पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया, फिर पूजा की थाली में से रोली और चन्दन का तिलक माथे कि लीलाट पर किया, बाबूजी और भी चमक उठे, तभी पोखरिया ने एक थाल सामने कर दिया, थाल में माचिस, फूलझड़ी और छुरछुरी रख्खी थी, बाबूजी ने माचिस की एक तिल्ली जलाकर एक, दो दीये प्रज्वलित किये, फिर परिवार के सभी सदस्यों ने दीया प्रज्वलित करना प्रारंभ कर दिया ।
"ए जी, ये , फूलझड़ी और छुरछुरी भी जला दीजिये", कौशल्या देवी ने अपने पति से कहा ।
"हाँ हाँ, लो, अभी जला देते हैं", बाबूजी ने फूलझड़ी और छुरछुरी दीये की रोशनी से प्रज्वलित किया, सारा वातावरण उस रोशनी से जगमगा उठा ।
सारे दीये जल चुके थे, उन दीयों की रोशनी ने अपने प्रकाश से पूरे अन्धकार को दूर कर दिया था, पूरा वातावरण और सजावट बस देखने ही लायक थी, कितने शांत स्वरुप में दीये और बत्ती जल जल कर प्रकाश के किरणों की अद्भुत छंटा बिखेर रही थी, उन पर से आँखें हटाई नहीं जा रही थी, कुछ छंण सभी मन्त्र मुग्ध हो कर दीये से निकलती रोशनी और प्रकाश को बस निहारते रहे , तभी किसी ने अनारदाना प्रज्वलित कर दिया !
अनारदाने की चमकती सफ़ेद रोशनी की किरणे में सभी नहा उठे, फिर तो फूलझड़ी, छुरछुरी और अनारदाना के जलने की झडी लग गयी ।
शरद ऋतु का मौसम हल्कि हल्कि दस्तक दे रहा था, भीनी भीनी ठण्ड पड़नी शुरू हो गयी थी जिससे वातावरण खुशनुमा और सुहाना हो गया था, ठण्ड के मौसम में उन इलाकों में रात में भगजोगनी (जुगनू) बहुत बड़े तादाद में निकला करती है, आज दीपावली की रात में इन भगजोगनियों ने अपनी धीमी धीमी सफ़ेद टिमटिमाते रोशनी से गज़ब की छंटा बिखेर रही थी, क्या शमां थी, शायद इन्हें शब्दों में पिरोया नहीं जा सकता।
बाबूजी ने बदरिया, पोखरिया और गंगवा को ईनाम में दस - दस रुपैये दिए, बदरिया की आँखें नम थी, उसकी मेहनत सफल हो चुकी थी, अपनी तारीफ सुन कर वह शरमा रहा था, बाबूजी और मलकिनी दोनों के पैर छू कर उसने अपनी कृतज्ञता प्रकट की ।
शहर के आस - पास के तीन चार प्रतिष्ठित व्यक्ति दीपावली की शुभ कामना व्यक्त करने हेतु पधार चुके थे, बाबूजी ने उन्हें सम्मान पूर्वक बरामदें में बिठलाया और पोखरिया को आवाज दी …………!
"अरे कुछ मिठाई, पकवान और चाय लेकर आओ, और चिलम भी सुलगा लेना, उन दिनों गुड़गुड़ा पेश करने का मतलब सम्मान पेश करना होता था, सभी बात चीत में मगन हो गए ।
परिवार के कुछ सदस्य शहर की दीपवाली का आनंद लेने हेतु घूमने निकल पड़े, बच्चें अपनी अपनी फूलझड़ी, छुरछुरी और अनारदाना जलाने और पटाखें छोड़ने में, मगन थे, घर कि औरतें चौका में रात के खाने की व्यवस्था में जुट गयी ।
क्रमश: (आगे की कहानी के लिए खंड ३ देखें)
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