काश ! “और वे लम्हे ......................???
(खंड ५)
मेला पहुंचते ही धीरेन ने कहा, "अरे राम खेलावन, सब गाडी मेला के थाना के बाहर लगा दो, फिर कौशल्या देवी से कहा कि "बड़की भौजी, हम बस अभी तहसीलदार साहब से मिल के आते हैं' ?
धीरेन जैसे ही वहां पहुंचा तो सामने तहसीलदार साहब को सामने पाया, लगा जैसे तहसीलदार साहब उसी का रास्ता देख रहे थे, बड़े तपाक से मिले और बोले कि "आपका ही राह देख रहा था, आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई, हम अभी चाय भिजवाते हैं" ।
"अरे नहीं तहसीलदार साहब, हम अभी - अभी राम खेलावन के यहाँ चाय पीकर चले हैं",
तहसीलदार साहब यह सुनकर चौंकें, पर उन्हों ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा, बोले, "हम आपके साथ एक सिपाही कर देते हैं, सरकस के मैनजर को हम बोल कर सारा इन्तेजाम करावा दिए हैं, वह आप सब के बैठने के लिए कुर्सी का प्रबंध किया है, कोई दिक्कत नहीं होगी ।
"आपके रहते भला कैसी दिक्कत ? हम तो आपके आभारी हैं"
"अरे यह आप कैसी बात कर रहर हैं, बी. डी. ओ. साहब से इसका जिक्र भी मत कीजियेगा नहीं तो हमारी नौकरी बस गयी समझो"
धीरेन मुस्कुरा कर रह गया, अच्छा तहसीलदार साहब, अब हमचलते है, सब को जरा मेला घूमा दें ।
"बड़की भौजी, सब इन्तेजाम हो गया है, चलिए जब तक सर्कस का टाइम होता है, सब को मेला घूमा लायें और लड़कन सब को झूला वगैरह पर झूला दें, फिर घर की औरतों से बोले कि तुम लोग को जो गरम कपड़ा खरीदना है, अभिये खरीद लो, फिर टाइम नहीं मिलेगा ।
"नातिन, तुम और जतिन, सब लड़कन को झुला, चकरी का खेल दिखा लाओ और ठीक सरकस शुरू होने के टाइम के पहले पहुँच कर वहाँ हमलोगों का इन्तेजार करना, कोई लड़कन को इधर उधर मत जाने देना ।"और राम खेलावन, तुम लोग दूसरा दिन आकर मेला घूम लेना, हम तहसीलदार साहब से बोल दिए हैं कि सरकस सिनेमा का पास बनवान देंगे" ।
"जी मालिक", इतना कह कर राम खेलावन अपने बैलों को खल्ली पानी और घास चरने को दिया, बांकी गाड़ीवानों ने भी ऐसा ही किया ।
"चलिए भौजी, हम लोग गरम कपड़ा देख लेते हैं और आपको थोडा मेला घुमा देते हैं", फिर अपनी पत्नी, बिरेन, हिरेन, उनकी पत्नियाँ, और अपने भतीजों की पत्नियों सब को साथ लेकर चल पड़ा ।
मेले का इन्तेजाम और दूकानों का एलाटमेंट बड़े सलीके से किया जाता था, सभी होटलें एक कतार से लगी रहती, गरम कपड़ों की दुकानें जो पंजाब, काश्मीर, दार्जिलिंग और विभिन्न जगहों से आती थी, उन सब को अलग से एक कतार में जगह दी जाती थी, कहने का मतलब कि एक प्रकार की दुकानों को एक कतार से जगह एलाट किया जाता था, ऐसा प्रबंध करने से सब को खरीदारी करने में बड़ी सहूलियत होती थी, गरम रेडीमेड कपडे बस इसी मेले मेँ मिलते थे, क्योंकि शहर में इस प्रकार की कोई दूकान नहीं थी, बहुत मांग रहती थी इनकी, कम्बल, कार्डिगन, स्वेअटर वगैरह सब उपलब्ध था, यही वजह थी कि परिवार के सभी सदस्य इस दूकान की ओर जा रहे थे ।
धीरेन रास्ते में सब को मेले की जानकारी साथ साथ देता जा रहा था, "भौजी ई रहा अपना लालमिया का दूकान और इसके ठीक सामने बेदानी कंपनी, ई दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है, हर साल बेदनी कंपनी लालमिया वाली जगह में अपना दूकान लगाना चाहता है, पर मेले के बंदोबस्त वाले जगह बदलने से इनकार कर देते हैं, बंदोबस्त करने वाले का कहना रहता है कि जो बरसों से जिस जगह पर अपना दूकान लगा रहा है, उसको वही जगह एलाट होगा, हर साल ई बेदानी कंपनी वाला झंजट जरूर पैदा करता है ।
धीरेन ने इतनी बातें विस्तार से इसलिए बतलाई कि ये कपडे के दोनों दुकानें शहर के सबसे बड़ी दूकान थे, हर साल मेले में अपना स्टाल लगाते थे, और लाखों की कमाई कर जाते, इसी बीच गरम कपड़ों वाली दुकानें आ गयी, सभी ने जम कर खरीदारी की ।
धीरेन ने कहा " सरकस का टाइम हो रहा है, चलिए भौजी, नतिन, जतिन सब इन्तेजार कर रहा होगा" ।
"हाँ हाँ चलो", अरे सब दुलहिन और कनिया, अब सब चलो, सरकस का टाइम हो रहा है, बहुते खरीदारी हो गया" ।
सभी सरकस की ओर प्रस्थान कर गए, रास्ते में औरतों ने फिर चूड़ी की दूकान पर रूक कर चूड़ियाँ और बिंदी खरीदी, साल भर की खरीदारी जो ठहरी ।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
क्रमश: (आगे की कहानी के लिए खंड ६ देखें)
No comments:
Post a Comment